भारतीय होने के बावजूद सता रहा है देश से निकाले जाने का डर

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Muslims drive against illegal immigrants
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भारत की पूर्वोत्तर राज्य असम में रहने वाली एक मुस्लिम महिला मरज़ीना बीबी को डर सता रहा है कि कहीं उसे राज्यहीन घोषित तो नहीं कर दिया जाएगा और उसे राज्य से बाहर तो नहीं निकाल दिया जाएगा.

26 वर्षीय मरज़ीना का नाम नागरिकों की प्रारंभिक सूची में नहीं था, जो 31 दिसंबर की आधीरात में प्रकाशित किया गया था, हालांकि उसके पास वोटर पहचान पत्र भी है और उनसे 2016 में राज्य के चुनावों में मतदान भी किया था.

बीबी ने पूछा कि “फिर वह मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे है ?” असम के फोफोंगा गांव में वह मिट्टी के घर में रहती है और बुनाई करती है. बीबी ने कहा कि “उसे लगता है कि मैं बांग्लादेशी हूं जबकि मैं भारत में ही पैदा हुई थी, मेरे माता-पिता यहीं पैदा हुए थे, मैं एक भारतीय हूं.”

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), जो अप्रैल 2016 के चुनाव जीतने के बाद असम में सत्ता में आई थी. सरकार ने पड़ोसी बांग्लादेश से अवैध मुस्लिम प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए अभियान शुरू किया है, लेकिन अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह अभियान मुसलमानों को भी निशाना बना रहा है जो भारतीय नागरिक हैं.

भाजपा के दो राष्ट्रीय प्रवक्ताओं ने अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा उठाए गए सवालों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है. नई दिल्ली में गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने ई-मेल का जवाब भी नहीं दिया और टेलीफोन कॉल द्वारा भी कोई जवाब नहीं दिया.

नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स की नए अपडेट्स के मुताबिक, असम के सभी निवासियों को साबित करना होगा कि वह या उनका परिवार देश में 24 मार्च 1971 से रहते है, तभी उन्हें भारत का वैध नागरिक समझा जाएगा.

असम में 32 मिलियन से ज्यादा लोगों के अपने घर, जिनमें से एक तिहाई मुसलमान हैं. 1980 में एक देशी असमिया समूह ने राज्य के बाहर से आये लोगों के खिलाफ हिंसक विरोध किया था जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे. जिसकी वजह से राज्य में बाहर से आये लोगों ने बड़े पैमाने पर नौकरियां और भूमिगत संसाधन और जमीन पर कब्ज़ा कर लिया था.

वहीँ बीबी ने यह भी कहा कि, “मुझे लगता है कि हमें निशाना इसलिए बनाया जा रहा है क्योंकि हम मुसलमान है.” उसने कहा कि उसने पहले ही साबित कर दिया है कि वह भारतीय हैं. बांग्लादेश से अवैध प्रवासी होने के आरोपों पर उन्हें आठ महीने के लिए जेल में बंद कर दिया गया था. राष्ट्रयता के दस्तावेज़ दिखाने के बाद उन्हें रिहा किया गया था.

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