नज़रियाः आज वही राष्ट्रवाद सच्चा माना जाता है जो आरएसएस कहता है।

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मोहम्मद नज्मुल क़मर

जब से सियासत और संगठन की ताकत को समझने लगा हूँ तब से एक अजीब ही बेचैनी बनी रहती है, जब आरएसएस का इतिहास और उसके दूर दर्शी प्लान को पढ़ता हूँ तो हैरत होती है और एक सबकB ही पाता हूँ कि निरन्तर अपने काम के प्रति समर्पित रहो तो कामयाबी ज़रूर मिलती है, आरएसएस ने1925 में जब अपनी स्थापना की तो उस समय जो सोच लेकर चलने का काम किया था उसपर आज तक वह क़ायम है और कामयाबी भी मिलती रही है, यह अलग बात है कि समय समय पर आरएसएस ने चीजों को टूल के हिसाब से इस्तेमाल किया और कामयाबी हासिल की, तिरंगा को अपना झंडा कभी न क़ुबूल करने वाली आरएसएस ने एक समय के बाद तिरंगा भी अपनाया और देशभक्ति का ढोंग भी अपनाया, आज वह कामयाब है।

आरएसएस ने ज़मीनी सतह पर खूब मेहनत की, गाँव गाँव, गली गली अपने प्रचारकों से काम लिया, अपनी शाखाओं के माध्यम से सोच बदलने का काम किया, आरएसएस ने अपने सदस्य काम बनाये मगर अपनी सोच को लोगों के ज़हन में पूरी तरह से डालने में सफलता हासिल की।

कहीं धर्म का सहारा लिया तो कभी राष्ट्रवाद का सहारा लिया,दलितों में हिन्दू होने का भ्रम पैदा किया, दलितों को धर्म के लिए लड़ने वाला बनाया, आरएसएस ने हर वह मुमकिन कोशिश की जो उसकी सोच और विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम कर सके।

राजनीति के लिए पार्टी बनाई तो तमाम दूसरे विभागों में अपना संगठन तैयार किया, डॉक्टरों, वकीलों, छात्रों से लेकर किसान और आदिवासियों के लिए अलग अलग संगठन तैयार किये, उसी लेवल पर अपना काम किया, सबके अंदर धर्म और राष्ट्र वाद का बीज बोया , आहिस्ता आहिस्ता वह फसल तैयार हुई और आज उसका परिणाम है कि देश की सत्ता पर वह क़ाबिज़ है !

आज वही राष्ट्रवाद सच्चा माना जाता है जो आरएसएस कहता है, वही देशभक्ति है जो आरएसएस कहता है, वही सेकलुरिज़्म है जो आरएसएस बताता है!

(लेखक रिसर्सच स्कॉलर हैं)

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